दूसरों से अपनी तुलना करना कैसे बंद करें? – खुद से जुड़ने की सच्ची शुरुआत
दूसरों से अपनी तुलना करना कैसे बंद करें? – खुद से जुड़ने की सच्ची शुरुआत
कभी आपने ध्यान दिया है…
आप अपनी ज़िंदगी में ठीक-ठाक चल रहे होते हैं।
काम भी है, घर भी है, जिम्मेदारियाँ भी निभा रहे होते हैं।
लेकिन अचानक मोबाइल खोलते ही मन भारी क्यों हो जाता है?
किसी की नई बाइक।
किसी का विदेश घूमना।
किसी की तरक्की की पोस्ट।
और बिना कुछ सोचे, मन के अंदर एक आवाज़ उठती है ...
मेरे पास ऐसा क्यों नहीं है?
मैं पीछे क्यों रह गया?
यहीं से शुरू होती है वो आदत, जो दिखती तो छोटी है,
लेकिन अंदर ही अंदर हमें तोड़ देती है -
दूसरों से अपनी तुलना।
अगर आप ये पढ़ रहे हैं और आपके मन में भी कभी ऐसा महसूस हुआ है,
तो पहले ही बता दूँ –
इस लेख में कोई आपको गलत नहीं कहेगा।
कोई आपको कमजोर नहीं मानेगा।
बस एक इंसान,
दूसरे इंसान से दिल से बात करेगा।
हम दूसरों से अपनी तुलना क्यों करते हैं?
ये सवाल बहुत ज़रूरी है।
क्योंकि जब तक कारण समझ नहीं आएगा,
तब तक समाधान सिर्फ किताबों में ही रहेगा।
बचपन से डाली गई तुलना की आदत
“देखो शर्मा जी का बेटा क्या कर रहा है।”
“तुम उससे पीछे क्यों हो?”
हम में से ज़्यादातर लोगों ने ये बातें बचपन से सुनते आए हैं।
किसी ने हमें ये नहीं सिखाया है कि
हर इंसान की क्षमता, हालात और रास्ता अलग होता है।
धीरे-धीरे हमारा दिमाग सीख गया –
खुद को समझने का तरीका = दूसरों से तुलना।
समाज और रिश्तेदारों का दबाव
हम ऐसे समाज में रहते हैं जहाँ
खुशी भी तुलना से मापी जाती है।
- किसका बेटा क्या कर रहा है
- किसके पास क्या है
- किसकी शादी कैसी हुई
और हम चाहकर भी इससे बच नहीं पाते।
Social Media और दिखावटी ज़िंदगी
आज का सबसे बड़ा कारण या बजाए है
Social Media।
यहाँ लोग अपनी पूरी ज़िंदगी नहीं दिखाते,
बस सबसे अच्छा हिस्सा दिखाते हैं।
लेकिन हमारा दिमाग उसे पूरी सच्चाई मान लेता हैं
और अपनी अधूरी ज़िंदगी से तुलना करने लगते हैं।
खुद पर भरोसे की कमी
जब इंसान खुद की कीमत नहीं समझ पाता,
तो वो दूसरों की ज़िंदगी को पैमाना बना लेता है।
दूसरों से तुलना करने से क्या नुकसान होता है?
तुलना सिर्फ सोच नहीं बिगाड़ती,
ये धीरे-धीरे पूरी ज़िंदगी पर असर डालती है।
आत्म-विश्वास कमजोर हो जाता है
आप चाहे कितना भी मेहनत कर रहे हों,
तुलना करने वाला इंसान खुद को हमेशा कम ही पाएगा।
मन में जलन और अपराधबोध
दूसरों की खुशी चुभने लगती है।
और फिर खुद को दोष देना शुरू हो जाता है।
Stress, Anxiety और Depression
लगातार खुद को पीछे मानना
मन को थका देता है।
अपनी growth रुक जाती है
जब ध्यान दूसरों पर होता है,
तो अपनी राह धुंधली हो जाती है।
Comparison और Social Media – सबसे बड़ा कारण
Social Media ने तुलना को बहुत आसान बना दिया है।
Edited ज़िंदगी, Unedited दर्द
कोई ये नहीं दिखाता कि
उस पोस्ट के पीछे कितनी थकान, डर और अकेलापन है।
Likes और Followers का झूठा पैमाना
हम अपनी कीमत
नंबरों से नापने लगते हैं।
Reality vs दिखावा
यहाँ ज़िंदगी कम,
दिखाने की कोशिश ज़्यादा होती है।
दूसरों से अपनी तुलना करना कैसे बंद करें?
अब सबसे ज़रूरी हिस्सा।
और यहाँ कोई जादुई तरीका नहीं है।
बस छोटे-छोटे सच हैं।
अपनी journey को समझिए
आप जिस रास्ते पर हैं,
वो आपका है।
किसी और की मंज़िल
आपकी हार नहीं होती।
Social Media से थोड़ी दूरी
पूरी तरह छोड़ना ज़रूरी नहीं,
बस खुद को बचाना ज़रूरी है।
अपनी progress लिखिए
जो आपके पास है,
जो आपने सीखा है –
उसे लिखिए।
Gratitude की आदत डालिए
जो नहीं है,
उससे पहले जो है,
उसे देखना सीखिए।
Inspire होना सीखिए, Compare नहीं
दूसरों की सफलता
आपकी असफलता नहीं है।
अपनी value खुद तय करें
आपकी कीमत
किसी और की ज़िंदगी से तय नहीं होती।
एक छोटी कहानी – जब तुलना ने अंदर से तोड़ दिया
मेरा नाम मुकेश है और में इस ब्लॉग का लेखक हूँ
जब मैने ये ब्लॉग शुरु किया मेरे पास कोई 5g फोन नहीं था
या कोई अच्छा फोन नहीं था एक लैपटॉप था जो खराब हो गया
मेरे आस पास के लोगों ने कुछ नए फ़ोन लिए लैपटॉप लिए ...
मुझे ऐसा लगा जैसे में इतना मेहनत करते हुए भी कुछ नहीं ले सकता
और को लोग कुछ नहीं करते उनके पास सब है
यही बात मुझे खाएं जा रही थी और मेरा फोन थोड़ा पुराना था
तो बहुत हैंग करने लगा हुआ ये कि में पोस्ट लिखना जी बंद कर दिया
करीब 2 तीन महीने तक
क्योंकि में दूसरों को देख के खुद को मापने लगा था
लेकिन हुआ ऐसा की मेरे जो आर्टिकल था बो गिरने लगा
क्योंकि मैने कम करना बंद कर दिया था
फिर मुझे समझ में आया कि उनकी लाइफ अलग है और मेरी अलग
उनके पास पहले से सब है लेकिन मुझे वहा पहचाने केलिए कुछ करना पड़ेगा
फिर मैने फैसला लिया कि किसी से कोई तुलना नहीं करूंगा
में अपनी जिंदगी अपनी ही हिसाब से चलाऊंगा और में उसी पुराने फोन से
कम करना शुरू कर दिया फिर से
और आज नया फोन है और ये ब्लॉग इसका सबूत है.....
Comparison छोड़ने के बाद ज़िंदगी में क्या बदलता है?
- मन हल्का हो जाता है
- आत्म-विश्वास बढ़ता है
- ज़िंदगी अपनी लगने लगती है
अक्सर जो पूछे जाने वाले सवाल है (FAQ)
हम बार-बार comparison क्यों करते हैं?
क्योंकि हमें खुद से जुड़ना नहीं सिखाया गया।
क्या comparison पूरी तरह गलत है?
नहीं, लेकिन जब वो आपको तोड़ने लगे, तब।
खुद से एक सवाल (Self-Reflection CTA)
क्या आप अपनी ज़िंदगी
किसी और की तस्वीर से नाप रहे हैं?
Coment me iska jawab zarur dena aur apni dosto ko zarur share karna...
Conclusion – आख़िरी बात दिल से
आप देर से चल रहे हैं,
ये सच हो सकता है।
लेकिन आप गलत रास्ते पर हैं –
ये ज़रूरी नहीं।
दूसरों की दौड़ छोड़िए।
अपनी चाल पहचानिए।
क्योंकि
आप जैसे हैं, वैसे ही काफी हैं।
किसी से कोई तुलना करके अपने लिए सिर्फ दीवार खड़ी करोगे और उसी खुद बाहर नहीं निकल पाओगे।
ज़िन्दगी को अपने ही हिसाब से जीना शुरू करदोगे तो एक दिन उन सबसे से भी ऊपर रहोगे ये kalowrites का वादा है ।

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